आंखें बंद कीं तो मन में छवि तुम्हारी आई,
जैसे बरसों की तपस्या ने फल अपनी पाई।
तुमसे मिलने का और कोई जरिया कहां,
बस मन के मंदिर में बसी तुम्हारी परछाई।
हर सांस में गूंजता नाम तुम्हारा प्यारा,
जैसे वृंदावन का बहे शीतल धारा।
मिलना हो न हो, ये दूरी भी कब रुकेगी,
तेरी मौजूदगी हर क्षण दिल को महकाएगी।
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