धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।
हर आह में बसी है उसकी सूरत,
रूह तक महके बिना ये ग़ज़ल अधूरी रहती है॥
उसकी याद आई है, साँसों ज़रा आहिस्ता चलो,
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।
दिल को चुप रहने दो, अश्कों को बहने दो,
इश्क़ में हर आहट से संवल पड़ता है॥
उसकी याद आई है, साँसों ज़रा आहिस्ता चलो,
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है।
दिल महकता है उसके ख़्यालों की खुशबू से,
इश्क़ में हर आहट से भी संकलन पड़ता है॥
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